नोएडा डीएम को हाईकोर्ट की फटकार, कहा- ‘तानाशाह’ अफ़सर राज्य को ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ बना देंगे

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और कार्यकर्ता आकृति चौधरी (25) की राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) के तहत हिरासत रद्द करते हुए नोएडा के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा हिरासत का आदेश जारी करने के तरीके की कड़ी आलोचना की।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने साफ़ तौर पर चेतावनी दी कि अगर अफ़सरशाही का ‘तानाशाही’ रवैया जारी रहा तो उत्तर प्रदेश एक “ऑर्वेलियन डिस्टोपिया” में बदल सकता है।

हाईकोर्ट वेबसाइट पर अब अपलोड विस्तृत आदेश में बेंच ने कहा कि रासुका के तहत चौधरी को हिरासत में रखने से अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, क्योंकि हिरासत का आदेश और उसके आधार ठोस सबूतों पर आधारित नहीं थे और उन्हें “बिना सोचे-समझे” जारी किया गया।

कोर्ट ने चौधरी को ₹5 लाख का मुआवज़ा देने का भी आदेश दिया और कहा कि यह रकम गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम (जिन्होंने हिरासत का आदेश जारी किया) और इसके लिए ज़िम्मेदार अन्य अफ़सरों (थाना प्रभारी तक) के वेतन से वसूली जाए।

चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक हैं और उन्हें अप्रैल 2026 में नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ़्तार किया गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने 13 मई को चौधरी और पत्रकार-अनुवादक सत्यम वर्मा के ख़िलाफ़ रासुका लागू किया। यह दोनों उन कई मज़दूरों और मज़दूर अधिकार कार्यकर्ताओं में शामिल थे, जिन्हें न्यूनतम पारिश्रमिक बढ़ाने समेत मांगों लेकर नोएडा में हुए विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ़्तार किया गया।

अपने 15 पृष्ठ के आदेश में बेंच ने अफ़सरशाही और पुलिस की भूमिकाओं पर कई अहम टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि अफ़सरों को बहुत ज़्यादा अधिकार दिए जाते हैं, क्योंकि उन पर नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, गरिमा, सम्मान और कल्याण की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी होती है।

हालांकि, कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनकी “वफ़ादारी संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति।” कोर्ट ने आगे कहा कि अफ़सर जनता की सेवा करने वाले सेवक होते हैं, और “लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है।”

कोर्ट ने चेतावनी दी कि जब नौकरशाह और पुलिस अफ़सर अपनी शपथ को नज़रअंदाज़ करते हैं और उसके उलट काम करते हैं तो लोग उन्हें “ब्रिटिश शासन की दमनकारी निशानी” के तौर पर देख सकते हैं, जिससे नागरिक अशांति का माहौल बन सकता है।

बेंच ने आगे कहा, “जल्द ही ऐसा समय आ सकता है, जब प्रशासन में मौजूद गलत काम करने वाले लोग उत्तर प्रदेश को ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ (एक ऐसी दमनकारी जगह जहाँ लोगों की आज़ादी छीन ली जाती है) में बदल देंगे।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना किसी ठोस वजह या सही कानूनी प्रक्रिया के नागरिकों की आज़ादी में दखल देने वाली ज्यादतियों या गैर-कानूनी कामों को ठीक करते समय, न्यायपालिका पीड़ित नागरिकों को मुआवज़ा दिलाने के लिए “सख्त आदेश” दे सकती है।

कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम के व्यवहार की खास तौर पर आलोचना की, जिन्होंने रासुका लगाए जाने के आदेश दिए थे। कोर्ट ने माना कि जब पुलिस रिपोर्ट में बिना किसी भरोसेमंद सबूत के सिर्फ़ आरोप लगाए गए हों तो डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से यह उम्मीद की जाती है कि वे एनएसए के सख्त प्रावधानों को लागू करने का फ़ैसला लेने से पहले रिकॉर्ड की ‘बारीकी से’ जांच करें।

बेंच ने पाया कि चौधरी छात्रा, कार्यकर्ता थीं, जिनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और सबूतों से यह पता नहीं चलता कि उन्होंने हिंसा भड़काई। कोर्ट ने इस नतीजे पर पहुंचते हुए कहा: “गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, जिन्होंने विवादित आदेश पारित किया, का व्यवहार निंदा के योग्य है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि हालात से पता चलता है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट चौधरी के ज़रिए “एक मिसाल कायम करना” चाहती हैं और दूसरों को सार्वजनिक जगहों पर मज़दूरों के समर्थन में बोलने और अपनी बात रखने की आज़ादी का इस्तेमाल करने से रोकना चाहती हैं।

(जनचौक ब्यूरो)

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